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जब कभी …

खुद पे ऐतबार कर के देख

ये सफर है जिंदगी का

बचपन का कोई खेल नहीं

कर्मभूमि है तेरी

दुनियां कोई जेल नहीं

न टिक पायेगा घड़ी भर

दुश्मन सामने तेरे

पूरी ताकत से वार कर के देख

न रुक न पीछे मुड

न किसी का इन्तज़ार कर के देख

मिलेगी मंजिल तुझको

खुद पे ऐतबार कर के देख

राहें पथरीली

न संगी न साथी

घनघोर अँधेरा

न दिया न बाती

रस्ते फिर भी कट जायेंगे

हौसला रख

कोशिश एक बार कर के देख

न रुक न पीछे मुड

न किसी का इन्तज़ार कर के देख

मिलेगी मंजिल तुझको

खुद पे ऐतबार कर के देख

अश्क बहाना छोड़ जरा

सुनहरे कल के सपने बुन

इन्द्र धनुष के रंगों में

कौन हैं तेरे अपने चुन

हिम्मत हार रुकना नहीं

थक जाये तो सुस्ताना

भटकने लगे मन तेरा तो

प्यार से दो पल समझाना

रस्ते यूँ ही बन जायेंगे

इरादों पे धार कर के देख

न रुक न पीछे मुड

न किसी का इन्तज़ार कर के देख

मिलेगी मंजिल तुझको

खुद पे ऐतबार कर के देख

रस्ते के कांटे – पत्थर चुन

हर कदम पे खुद की एक निशानी छोड़

अपनी खुद की राह बना

पर्वत काट, रुख दरिया का मोड

खूंखार जानवर कितने ही हों

खड़े मुंह फैलाये चारों ओर

बहेलिये कितने ही जाल बिछाएं

दुश्मन लगा ले जितना जोर

तुझको न कोई छू पायेगा

चुनौतियों से हाथ दो चार कर के देख

न रुक न पीछे मुड

न किसी का इन्तज़ार कर के देख

मिलेगी मंजिल तुझको

खुद पे ऐतबार कर के देख

किनारे पे कुछ हाथ न आएगा

जरा गहरे उतर के मोती ढूंढ

खुशियाँ बाँट सके संग जिनके

ऐसे कुछ हमजोली ढूंढ

कुछ तन्हाई में

कुछ अश्कों में

कुछ आहों में

कुछ घावों में

दुःख तो यूँ ही बंट जायेंगे

ना घबराना चलते जाना

बस जिंदगी से प्यार कर के देख

न रुक न पीछे मुड

न किसी का इन्तज़ार कर के देख

मिलेगी मंजिल तुझको

खुद पे ऐतबार कर के देख

—-ऊषा राजेश शर्मा

तुम्हारी याद …

झीने परदों से छनती
सूरज की मखमली किरणों सी
मन में एक आस जगाती है
हर पल याद तुम्हारी आती है
सोचती हूँ तुमसे कहूँ कि नही

जब भी घेरने लगती है उदासी
गलबहियां डाले चुपके से

अपना जादू सा बिखराती है
हर पल याद तुम्हारी आती है
सोचती हूँ तुमसे कहूँ कि नहीदोपहर की तपती धूप में
माँ की ममता का आँचल बन
बालों को हौले हौले – सहलाती है
हर पल याद तुम्हारी आती है
सोचती हूँ तुमसे कहूँ कि नही

शाम का धुंधलका जब छाने लगता है
हारे थके मन का संबल बन
थाम उंगली, दहलीज पे खडी मुस्काती है
हर पल याद तुम्हारी आती है
सोचती हूँ तुमसे कहूँ कि नही

रात के गहराते अँधेरे लम्हों में
नन्ही परियों की चित्रकथा सी
सुन्दर सपनों से बहलाती है
हर पल याद तुम्हारी आती है
सोचती हूँ तुमसे कहूँ कि नही

सुबह – सबेरे , शाम- दोपहर
जीवन की मुश्किल राहों में
दिए की लौ बन ज्योत जगाती है
हर पल याद तुम्हारी आती है
सोचती हूँ तुमसे कहूँ कि नही

हर टूटे सपने का दर्द
जब आँखों से लहू सा बहता है
हौले से जख्मों पे मरहम लगाती है
हर पल याद तुम्हारी आती है
सोचती हूँ तुमसे कहूँ कि नही…

——उषा राजेश शर्मा

 

Jindagi Ka Safar

Jindagi ki raah mein badhte kadam
Mud gaye jahan saaye nazar aaye
Mile bahut apne paraye magar
Kuch hamein chhod gaye
Kuchh ko hum chhod aaye…

Jindagi chalti rahi, Kafila banta raha
Raah mein Kai mushkilein aur tufaan aaye
Awaaz de de ke hamne  pukara bahut, magar
Na jane walon ne dekha palat ke
Na wo dikhe jinhein hum chhod aaye…

Badh gayi dooriyan aur jindagi sikud gayi
Waqt tham gaya, aise bhi kuchh mukaam aaye
Yun to kami kisi cheez ki nahin magar
Kyon chahta hai dil, purane pal lauta de jo
Kash ! Jindagi mein aisa koi mod aaye…

मुहब्बत

चीज़ों से मुहब्बत और इंसानों को इस्तेमाल करते हैं लोग
मिलती नहीं हमें मुहब्बत, फिर ये शिकायत करते हैं लोग

जब इंसानों को प्यार और चीज़ों कों इस्तेमाल करना सीख लेंगे
हथियारों की न रहेगी ज़रूरत, बस मुहब्बत से जंग जीत लेंगे

——– उषा राजेश

 

मेरा साया…

चेहरों से हटा नज़रें , जब दिलों के अंदर देखा
रहे-जिंदगी में हमने, अजब सा ये मंजर देखा

हमारी उँगलियाँ पकड़ जिन्होंने कभी चलना सीखा
उन्ही हाथों में हमीं पे आज तना हुआ खंजर देखा

जिन बंद पलकों में झिलमिलाते थे अश्क मोती बन
उन्हीं खुली पलकों में कभी दरिया कभी समंदर देखा

जिनका पसीना दौड़ता है रगों में आज भी लहू बनके
पैरों तले कुचलता हुआ उन्हीं हड्डियों का पंजर देखा

पीली सरसों हुई सुर्ख लहू सी और तितलियाँ बेरंग
लहलहाते खेतों में बस इक मेरा टुकड़ा बंजर देखा

मेरा ही साया मुझे किस क़दर यूँ आज पशेमाँ कर गया
दूसरों को छोड़ खुद का अक्श जब आइने के अंदर देखा

मैं…

दोस्त, दुश्मन न किसी की हमसफ़र हूँ मैं
ग़मे जिंदगी का एक तनहा सफर हूँ मैं

पास आकर हर कोई मुड जाता है इस तरह
जैसे उजड़ी हुई पुरानी कोई रहगुजर हूँ मैं

कोई कहे नासेह, रहनुमा किसी के लिए
कहता है कोई, एक सजायाफ्ता रहबर हूँ मैं

सर उठाकर देखती हूँ ज्यों उस तरफ
लगता है कोई ढलती हुई सहर हूँ मैं

सुनती हूँ गुफ्तगू के यही चर्चा है हर तरफ
लोग कहते हैं के बहुत अच्छी सुखनवर हूँ मैं

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